रोहतास : देश में कई ऐतिहासिक पुल अपनी अनोखी बनावट और रोचक कहानियों के लिए जाने जाते हैं लेकिन बिहार के डिहरी -ऑन -सोन में स्थित एक ऐसा पुल है जो हर साल लोगों को चौंका देता है। यह पुल बरसात में आंखों से ओझल हो जाता है और गर्मी-सर्दी में फिर से धरती पर उभर आता है मानो इतिहास खुद पानी चीरकर सामने आ गया हो।
करीब 500 साल पहले ऐतिहासिक जीटी रोड (Grand Trunk Road) के विस्तार के दौरान सोन रिवर के बीचों-बीच इस अद्भुत पत्थर पुल का निर्माण कराया गया था। माना जाता है कि यह पुल रोहतास और औरंगाबाद को जोड़ने वाला महत्वपूर्ण संपर्क मार्ग था। भारी-भरकम पत्थरों के स्लीपर से बना यह पुल लगभग साढ़े तीन किलोमीटर लंबा और करीब 17 फीट चौड़ा बताया जाता है।
इतिहासकारों और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस पुल का निर्माण मध्यकालीन अफगान शासक शेरशाह सूरी ने अपने शासनकाल (1540–1545) में करवाया था। शेरशाह सूरी अपनी बेहतरीन प्रशासनिक क्षमता और सड़क नेटवर्क के विकास के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। सामरिक और व्यापारिक दृष्टि से अहम मार्गों और ढांचों का निर्माण उनकी बड़ी उपलब्धियों में गिना जाता है।और यह पुल उसी दूरदृष्टि का प्रमाण माना जाता है।
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इस पुल की सबसे चौंकाने वाली खासियत इसका अदृश्य हो जाना है। बरसात में जैसे ही सोन नदी का जलस्तर बढ़ता है पूरा पुल पानी में समा जाता है। ऊपर से देखने पर ऐसा लगता है जैसे यहां कभी कोई पुल था ही नहीं। लेकिन पानी घटते ही नदी के बीच पत्थरों की लंबी कतार फिर से उभर आती है। स्थानीय लोगों के लिए यह नजारा हर साल किसी चमत्कार से कम नहीं होता।
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बताया जाता है कि पुल के प्रत्येक पत्थर स्लीपर की लंबाई लगभग 9 से 10 फीट तक है। सदियों बाद भी इन पत्थरों की मजबूती मध्यकालीन कारीगरी और इंजीनियरिंग कौशल की मिसाल पेश करती है।
समय के साथ सोन नदी पर आधुनिक पुलों का निर्माण हो गया और आवागमन के नए साधन विकसित हो गए। नतीजतन इस ऐतिहासिक पुल की उपयोगिता लगभग समाप्त हो गई और आज यह इतिहास की एक मौन गवाही बनकर रह गया है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि पुरातत्व विभाग की उदासीनता और स्थानीय स्तर पर देखरेख की कमी के कारण यह बेशकीमती धरोहर धीरे-धीरे क्षरण का शिकार हो रही है। यदि समय रहते संरक्षण के ठोस कदम नहीं उठाए गए। तो आने वाली पीढ़ियां इस अदृश्य पुल को केवल किताबों में ही पढ़ पाएंगी।
यह पुल सिर्फ पत्थरों का ढांचा नहीं बल्कि भारत की मध्यकालीन इंजीनियरिंग, प्रशासनिक दूरदृष्टि और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। जरूरत है कि इस धरोहर को संरक्षित किया जाए। इस पर गंभीर शोध हो और इसे पर्यटन मानचित्र पर सम्मानजनक स्थान मिले ताकि 500 साल पुरानी यह कहानी आने वाले 500 साल तक यूं ही जिंदा रहे।
रिपोर्ट:- मिथिलेश कुमार
स्थान:- रोहतास (बिहार)


























