Phulera Dooj flower holi: फाल्गुन माह की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाई जाने वाली फुलेरा दूज पर मंदिरों में फूलों की होली खेलने की खास परंपरा है. हर साल श्रद्धालुओं के मन में सवाल रहता है कि आखिर इस दिन रंगों की बजाय फूलों की होली क्यों खेली जाती है, इसके पीछे धार्मिक मान्यता, ब्रज संस्कृति और श्रीकृष्ण-राधा की लीलाओं से जुड़ी खास परंपरा मानी जाती है.
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धार्मिक मान्यता
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने राधा रानी के साथ सबसे पहले फूलों की होली खेली थी, उसी परंपरा की याद में फुलेरा दूज पर मंदिरों में भगवान को फूलों से सजाया जाता है और फूलों की वर्षा की जाती है, इसे प्रेम और भक्ति का प्रतीक माना जाता है. ब्रज क्षेत्र, खासकर वृंदावन और मथुरा में इस दिन से होली उत्सव की शुरुआत हो जाती है. प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर में फुलेरा दूज पर विशेष फूलों की होली आयोजित होती है, जहां हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं.
फूलों की होली का सांस्कृतिक महत्व
फूलों की होली वसंत ऋतु के स्वागत का प्रतीक मानी जाती है, यह संदेश देती है कि होली केवल रंगों का नहीं, बल्कि प्रेम, सौहार्द और प्रकृति के उत्सव का पर्व है. फूलों की खुशबू और रंग-बिरंगे पुष्पों से खेली जाने वाली यह होली पर्यावरण के लिए भी सुरक्षित मानी जाती है, इसलिए कई लोग अब इसे “ईको-फ्रेंडली होली” की शुरुआत भी कहते हैं.
शुभ कार्यों की शुरुआत
फुलेरा दूज को बेहद शुभ दिन माना जाता है, इस दिन विवाह, सगाई, गृह प्रवेश और नए काम शुरू करने की परंपरा है, मान्यता है कि इस दिन भगवान की पूजा और फूल अर्पित करने से घर में सुख-समृद्धि आती है.
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