लेखक-डॉ. लक्ष्मण यादव ( लेखक-प्रोफेसर की डायरी)
इन तस्वीरों को ज़रा गौर से देखिए। आपको क्या नया दिखा? मुझे इनमें सिर्फ नीली ड्रेस और लाल टोपी नहीं दिखी—मुझे इतिहास की दो धाराओं के बीच कम होती दूरी, एक नई उम्मीद, एक विचार और भविष्य की राजनीति की आहट दिखी।
रंग जब राजनीति में उतरते हैं तो सिर्फ रंग नहीं रहते। वे स्मृतियाँ बनते हैं, संघर्षों की पहचान बनते हैं और कई बार आने वाले समय का संकेत भी। नीली ड्रेस के साथ लाल टोपी की यह तस्वीर इसलिए साधारण नहीं है। इसके पीछे दो रंग हैं और दोनों के पीछे लंबा राजनीतिक इतिहास।
लाल दुनिया भर में मजदूर-किसान संघर्षों की पहचान रहा है। भारत की समाजवादी धाराओं ने इसे संघर्ष, बराबरी और परिवर्तन से जोड़ा। उत्तर प्रदेश में लाल टोपी और लाल झंडा समाजवादी राजनीति की ऐसी पहचान बने कि रंग देखते ही आंदोलन और विचार दोनों याद आते हैं।
हरा भी किसी एक विचार की जागीर नहीं रहा। किसान आंदोलनों और ग्रामीण राजनीति से लेकर जनता दल और जनता दल (सेक्युलर) जैसी राजनीतिक धाराओं तक यह अलग-अलग रूपों में मौजूद रहा। राजनीति में रंग का अर्थ रंग स्वयं नहीं, उसे उठाने वाला आंदोलन तय करता है।
नीला बाबा साहब आंबेडकर के विचारों से निकली बराबरी, संविधान, अधिकार और स्वाभिमान की राजनीति का शक्तिशाली प्रतीक बना। कांशीराम ने इसी बहुजन चेतना को संगठन, प्रतिनिधित्व और सत्ता की दावेदारी में बदला। उत्तर प्रदेश में नीला दलित-बहुजन समाज की राजनीतिक आकांक्षाओं की सबसे मुखर दृश्य भाषा बना।
भगवा भाजपा से जुड़ा ही माना जाता है।मगर बुद्ध के चीवर से त्याग और संन्यास की परंपराओं, शिवाजी के स्वराज्य और भगत सिंह के क्रांतिकारी ‘बसंती चोले’ तक इसके अर्थ त्याग, साहस और बलिदान से जुड़ते रहे। आधुनिक राजनीति में हिंदुत्व की धाराओं और भाजपा ने इसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अपनी प्रभावशाली राजनीतिक पहचान बना लिया।
इसी इतिहास के बीच सपा प्रमुख अखिलेश यादव के कंधे पर नीला गमछा और समाजवादी छात्र सभा के नौजवानों की नीली ड्रेस के साथ लाल टोपी महज़ रंगों का बदलाव नहीं लगता। अखिलेश ने लाल छोड़ा नहीं, लाल के साथ नीला जोड़ा है। यह समाजवादी और आंबेडकरवादी-बहुजन धाराओं के बीच की पुरानी राजनीतिक दूरी को कम करने का संकेत हो सकता है।
2024 में PDA को इसकी पहली बड़ी चुनावी जमीन मिली। सपा यूपी की 80 में से 37 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी और कांग्रेस के साथ INDIA गठबंधन 43 सीटों तक पहुँचा। करीब 33.6% वोट ने बताया कि PDA नई उम्मीद है। 2027 की चुनौती इस विस्तार को स्थायी सामाजिक गठबंधन में बदलने की है।

मगर रंग तभी विचार बनते हैं, जब वे प्रतिनिधित्व में उतरें; प्रतीक तभी भरोसा बनते हैं, जब वे हिस्सेदारी में दिखाई दें। इसलिए लाल-नीले की असली परीक्षा गमछे, टोपी और ड्रेस में नहीं, संगठन, नेतृत्व और टिकटों में होगी। यहीं से यूपी की सियासत में बदलाव की दस्तक दे रही है।
यूपी ने लाल की सत्ता देखी, नीले की सत्ता देखी और भगवे का विस्तार भी। अब तस्वीर में कुछ नया है— नीली ड्रेस के साथ लाल टोपी। बदलती राजनीति के प्रतीकों को समझने के लिए ये दृश्य ऐतिहासिक हैं।
अखिलेश यादव से इसी उम्मीद के साथ कि यह लाल टोपी और नीली ड्रेस सिर्फ तस्वीर में साथ न रहें, इनके पीछे खड़ी सामाजिक धाराएँ भी करीब आएँ। बाबा साहब और कांशीराम की हिस्सेदारी और प्रतिनिधित्व की चेतना, लोहिया से लेकर नेताजी की समाजवादी बराबरी और संघर्ष की धारा से मिले।
लाल और नीला एक हो रहे हैं। ये एका महज़ रंगों की नहीं है, विचार में होने जा रही है, समाज में गहराती जा रही है, सत्ता में हिस्सेदारी के लिए दावेदारी करेगी और सामाजिक न्याय के भविष्य का नया रंग रचेगी।
उम्मीद, विचार और स्वप्न की छवियाँ गहरी हैं।


























