Supreme Court Knowledge : क्या आप जानते हैं कि अगर पुलिस आपको गिरफ्तार करने पहुंचे, तो आपके पास भी कुछ कानूनी अधिकार होते हैं? इसके साथ ही गिरफ्तारी के दौरान पुलिस को भी कुछ नियमों का पालन करना पड़ता है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला आम आदमी के गिरफ्तारी से जुड़े अधिकारों की रक्षा के लिहाज से काफी अहम है। देश का सर्वोच्च न्यायालय समय-समय पर भारतीय संविधान के संरक्षक की भूमिका निभाता रहा है। कई मौकों पर आम नागरिक के मूल अधिकारों की रक्षा के लिए कई अहम फैसले लेता रहा है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा है कि बिना लिखित आधार बताए की गई गिरफ्तारी असंवैधानिक और अवैध मानी जाएगी। सरल शब्दों में कहें तो यदि गिरफ्तारी का आधार आरोपी को लिखित रूप में नहीं दिया जाए तो वह गिरफ्तारी असंवैधानिक होगी और इसमें शामिल पुलिस अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई होगी।
असंवैधानिक गिरफ्तारी पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस प्रशासन को फटकार लगाते हुए असंवैधानिक गिरफ्तारी पर महत्वपूर्ण एवं ऐतिहासिक दिशा-निर्देश दिए हैं। न्यायमूर्ति उज्जवल भुइयां एवं न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदरकर की पीठ ने जसकरण जीत सिंह बनाम पंजाब राज्य में यह स्पष्ट किया है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत यदि गिरफ्तारी का कारण आरोपी को लिखित रूप में उपलब्ध नहीं कराया जाता है तो वह गिरफ्तारी अवैध एवं असंवैधानिक होती है, और किसी भी तरह का निर्देश उल्लंघन गिरफ्तार व्यक्ति की तत्काल रिहाई का कारण बनेगा। साथ ही इस प्रकरण में शामिल पुलिस अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई भी होगी। न्यायालय ने यह सुरक्षा अनुच्छेद 22(2) तक भी इसे विस्तारित किया है। अनुच्छेद 22(2) के अनुसार, गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के अंदर निकटतम न्यायिक (यात्रा के आवश्यक समय को छोड़कर) मजिस्ट्रेट के समक्ष उपस्थित कराना आवश्यक है और यह आरोपी का अधिकार है।
क्या है पूरा मामला?
जसकरण जीत सिंह को एक नाबालिग के साथ यौन उत्पीड़न के आरोप में पॉक्सो एक्ट 2012 एवं भारतीय न्याय संहिता 2023 के अंतर्गत गिरफ्तार किया गया था। जब उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया तो मजिस्ट्रेट ने मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य (2025) के निर्णय को आधार बनाकर इस गिरफ्तारी को अवैध घोषित किया और उनकी तत्काल रिहाई का आदेश दिया। इसका कारण यह था कि पुलिस ने हिरासत में लेते समय आरोपी को लिखित में कारण नहीं बताया था। मजिस्ट्रेट ने यह स्पष्ट किया कि संवैधानिक आवश्यकताओं को पूरा करने के बाद जांच एजेंसी उन्हें हिरासत में ले सकती है। जब यह मामला माननीय पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय पहुंचा तो न्यायालय ने इस आदेश पर रोक लगा दी। आरोपी ने इस स्थिति में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
न्यायालय ने यह साफ कर दिया है कि गिरफ्तारी का आधार लिखित रूप में और ऐसी भाषा में उपलब्ध कराया जाना चाहिए, जिसे आरोपी समझ सकता हो। न्यायालय ने कहा कि इस अधिकार के किसी भी हनन को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। न्यायालय के अनुसार गिरफ्तारी का कारण न बताने की वजह से अगर आरोपी को रिहा किया जाता है और उसके बाद जांच एजेंसी को आरोपी की हिरासत में पूछताछ आवश्यक लगती है, तो पहले लिखित रूप में गिरफ्तारी के आधार स्पष्ट करने होंगे। इसके बाद मजिस्ट्रेट के समक्ष पुनः हिरासत हेतु आवेदन देना होगा। इस आवेदन में पुनः गिरफ्तारी की आवश्यकता और पहली गिरफ्तारी में आधार न बताए जाने का कारण लिखना होगा। ऐसे आवेदन पर संबंधित पुलिस अधिकारी को तत्काल वरिष्ठ अधिकारी का अनुमोदन भी आवश्यक होगा। ऐसे दोषी पुलिस अधिकारी के विरुद्ध अनिवार्य विभागीय कार्रवाई करने के निर्देश भी दिए गए हैं। न्यायालय ने साथ में यह भी कहा कि मामले के तथ्यों एवं परिस्थितियों के आकलन के पश्चात उच्च न्यायालय अनुच्छेद 22(2) के उल्लंघन के लिए लोक विधि संबंधी उपचार के रूप में क्षतिपूर्ति देने के निर्देश भी दे सकता है।
जानिए क्या कहता है भारत का संविधान?
भारत के संविधान ने अनुच्छेद 22(1) के तहत हर व्यक्ति, चाहे वह भारत का नागरिक हो या ना हो, उसे गिरफ्तारी संबंधित मौलिक अधिकार दिए हैं। यदि किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी होती है तो उसे उसकी गिरफ्तारी के कारणों से अतिशीघ्र अवगत कराना होगा, ऐसा नहीं करने पर उसे हिरासत में रखना गैर-कानूनी है। यह अनुच्छेद उसे यह अधिकार भी देता है कि ऐसी स्थिति में वह अपने पसंद के वकील से परामर्श कर सके और अपना विधिक प्रतिनिधित्व करा सके। सरल शब्दों में कहें तो अनुच्छेद 22(1) गैरकानूनी गिरफ्तारी से बचाव का हथियार है। हालांकि कुछ विशेष परिस्थितियों में, खास तौर पर सुरक्षा कारणों को ध्यान में रखते हुए, इन अधिकारों पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है, जो कि संविधान के अनुच्छेद 22(3) से स्पष्ट होता है। संविधान के अनुसार दो परिस्थितियों में अनुच्छेद 22(1) में दिए गए अधिकारों पर रोक लगाई जा सकती है, पहला किसी विदेशी नागरिक पर जिसका देश उस समय भारत का शत्रु देश हो, दूसरा यदि किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी निवारक निरोध (प्रिवेंटिव डिटेंशन) के कानून के अंतर्गत हुई हो, ऐसे में उस व्यक्ति को 24 घंटे के अंतर्गत मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने या मनपसंद वकील से कानूनी सलाह लेने जैसे अधिकार नहीं मिल पाते हैं। हालांकि प्रिवेंटिव डिटेंशन के मामलों में भी संविधान कुछ सुरक्षा जैसे सलाहकार बोर्ड की समीक्षा का अधिकार देता है। इस प्रकार राज्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राष्ट्र रक्षा के उत्तरदायित्व के बीच संतुलन बनाता है।

गैरकानूनी हिरासत की स्थिति में आप क्या करें?
अब बड़ा सवाल ये है कि अगर पुलिस आपको गैरकानूनी तरीके से गिरफ्तार करती है तो आप क्या एक्शन ले सकते हैं? आप अपनी गिरफ्तारी के कारणों को लिखित में जानने, अपने अधिवक्ता से परामर्श करने एवं 24 घंटे के अंदर न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किए जाने की मांग करें। ऐसे गैर-कानूनी हिरासत के विरुद्ध भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय या फिर अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर करें। परिस्थितियों के अनुसार पीड़ित व्यक्ति मुआवजे और संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध उचित कार्रवाई की मांग भी कर सकते हैं।
लेखक– रितीश उपाध्याय,
अधिवक्ता,
सुप्रीम कोर्ट, भारत






















