लेखक – रितीश उपाध्याय, अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट
Legal Knowledge: न्याय केवल अदालतों के दरवाज़े खुले होने से नहीं मिलता। उसके लिए यह भी जरूरी है कि आम नागरिक अपने अधिकारों को समझते हुए न्यायालय की प्रक्रिया में हिस्सा ले सके और उसे एक सक्षम वकील की सहायता मिल पाए। लेकिन जब वकील की फीस चुकाना ही किसी व्यक्ति के लिए नामुमकिन हो जाए, तो न्याय तक उसकी पहुँच एकदम सीमित हो जाती है। इसी प्रकार की असमानता को दूर करने के लिए भारत के संविधान ने निःशुल्क कानूनी सहायता की व्यवस्था प्रदान की है। लेकिन अहम सवाल यह है कि क्या यह व्यवस्था ज़रूरतमंदों को सिर्फ वकील उपलब्ध करा रही है या सच में आमजन को प्रभावी प्रतिनिधित्व और न्याय दिला पा रही है?
अनुच्छेद 39A के अंतर्गत भारत के संविधान ने राज्य को यह निर्देश दिया है कि कानूनी व्यवस्था समान अवसर के आधार पर न्याय को बढ़ावा दे और आर्थिक या किसी और प्रकार की अक्षमताओं के कारण किसी नागरिक को न्याय से वंचित न होने दिया जाए। यह राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों का हिस्सा है। सर्वोच्च न्यायालय ने मुफ़्त कानूनी सहायता को निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया के संवैधानिक सिद्धांत से जोड़ा है, साथ ही न्यायालय ने समय-समय पर यह माना है कि अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का अर्थ केवल जीवित रहने का अधिकार नहीं, बल्कि कानून के अनुरूप निष्पक्ष प्रक्रिया और न्याय मिलना भी है। हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य 1979, में सुप्रीम कोर्ट ने लंबे समय से जेलों में बंद कैदियों की स्थिति पर ध्यान दिया और इस फैसले ने यह भी स्पष्ट किया कि गरीब व्यक्ति को मुफ्त कानूनी सहायता न मिलना निष्पक्ष न्याय के रास्ते में गंभीर बाधा है। कानूनी अधिकार तभी सार्थक हैं, जब व्यक्ति उन्हें इस्तेमाल करने की स्थिति में भी हो।
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किसे, कब और कैसे मिल सकती है मुफ्त कानूनी सहायता?
लीगल सर्विसेज़ ऑथोरिटी एक्ट, 1987 ने इस संवैधानिक उद्देश्य को लागू करने के लिए राष्ट्रीय, राज्य, जिला और तालुका स्तर पर संस्थागत व्यवस्था बनाई है। इस अधिनियम की धारा 12 के तहत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्य, मानव तस्करी या बेगार के पीड़ित, महिलाएं, बच्चे जिनकी उम्र 18 वर्ष से कम है, दिव्यांग व्यक्ति, निर्दिष्ट आपदाओं और हिंसा के पीड़ित, औद्योगिक श्रमिक तथा हिरासत में रखे गए व्यक्ति मुफ्त कानूनी सहायता के पात्र हैं। इन सब के अलावा सामान्य वर्ग के लोग जो निर्धारित आय-सीमा के भीतर आते हैं वो भी सहायता माँग सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट में मामलों के लिए राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) के अनुसार वार्षिक आय की सीमा पाँच लाख रुपये है। अन्य अदालतों में आय सीमा संबंधित राज्य या केंद्रशासित प्रदेश के अपने अपने नियमों के अनुसार अलग हो सकते हैं। महिला,बच्चे, अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए आय की शर्त नहीं है। हालांकि, केवल पात्रता होने से हर मामला स्वतः स्वीकार नहीं हो जाता है, अधिनियम की धारा 13 के अंतर्गत संबंधित प्राधिकरण को प्रथम-दृष्टया यह संतुष्टि होनी चाहिए कि मामले में कुछ आधार मौजूद है।
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कानूनी सहायता में न सिर्फ वकील की नियुक्ति बल्कि उसके साथ कानूनी सलाह, याचिकाओं और जरूरी दस्तावेजों की तैयारी, अदालत में पैरवी तथा लागू नियमों के अनुसार अन्य आवश्यक मुकदमेबाजी खर्च शामिल हो सकते हैं। इसके लिए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, तालुका विधिक सेवा समिति, उच्च न्यायालय की विधिक सेवा समिति या सर्वोच्च न्यायालय की विधिक सेवा समिति से संपर्क किया जा सकता है। NALSA की हेल्पलाइन 15100 और उसकी आधिकारिक वेबसाइट भी जानकारी पाने के माध्यम हैं।
क्या है सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला?
सिर्फ वकील मिलना ही काफी नहीं है, कानूनी सहायता की असल परीक्षा अदालत में होती है। उम्मेद देवी बनाम राजस्थान राज्य 2026 के मामले में हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इसी अंतर को स्पष्टता से रेखांकित किया है। दहेज संबंधी माँग और कथित उत्पीड़न से जुड़े मामले में अपनी बेटी की मृत्यु के संबंध में आरोपित व्यक्तियों की बरी किए जाने के खिलाफ उम्मेद देवी ने अपील की थी। अपील को दाखिल करने में 19 दिन की देरी हुई और उसे माफ कराने के लिए जरूरी आवेदन नहीं लगाया गया था। हाई कोर्ट में उनकी ओर से कोई वकील उपस्थित नहीं हुआ और मामला बंद कर दिया गया । सर्वोच्च न्यायालय ने अपील को स्वीकार करते हुए कहा कि अदालतों को ऐसे कठिनाइयों के प्रति संवेदनशील रहना चाहिए। जहाँ वकील की अनुपस्थिति या अपर्याप्त सहायता से किसी व्यक्ति का कानूनी अधिकार प्रभावित हो सकता है, वहाँ अदालत को प्रभावी कानूनी सहायता सुनिश्चित करने पर विचार करना चाहिए। यह फैसला महत्वपूर्ण इसलिए है क्यों कि सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा है कि कानूनी सहायता को केवल वकील नियुक्त करने की औपचारिकता नहीं माना जा सकता है। वकील को समय-सीमा का ध्यान रखना, जरूरी आवेदन दाखिल करना, मुवक्किल को प्रक्रिया समझाना और सुनवाई के दौरान प्रभावी पैरवी करना भी बेहद जरूरी है। यदि ये बुनियादी जिम्मेदारियां पूरी न हों, तो काग़ज़ पर उपलब्ध सहायता भी व्यक्ति को न्याय मिलने से वंचित रख सकती है। नेशनल लीगल सर्विसेज़ अथॉरिटी (फ्री एंड कॉम्पिटेंट लीगल सर्विसेज) रेगुलेशनस, 2010 में पैनल के वकीलों के चयन और उनके काम की निगरानी के प्रावधान हैं। जरूरत इस बात की है कि इन प्रावधानों को काग़ज़ से निकालकर व्यवहार में लागू किया जाए। नियमित समीक्षा, उचित प्रशिक्षण, मुवक्किलों से संवाद और खराब प्रदर्शन पर जवाबदेही तय करना भी अति आवश्यक है।

मुफ्त कानूनी सहायता के समक्ष जागरूकता की कमी, अनुभवी वकीलों तक लोगों की पहुँच नहीं होना, सीमित संसाधन और कमजोर निगरानी जैसी चुनौतियां खड़ी हैं। ग्रामीण क्षेत्रों, वंचित समुदायों और समाज के उस वर्ग तक जिसको इसकी सब से ज़ादा ज़रूरत है, वहाँ लोगों में इसकी जानकारी नहीं है। अभी सबसे आवश्यक है आवेदन की प्रक्रिया सरल बनाना, स्थानीय भाषाओं में जानकारी देना, लोगों को जागरूक करना और कानूनी सहायता पाने वालों से नियमित संवाद कायम करते रहना ।
मुफ्त कानूनी सहायता किसी पर किया गया कोई उपकार नहीं, बल्कि समान न्याय की संवैधानिक प्रतिबद्धता का हिस्सा है। इसकी सफलता नियुक्त वकीलों की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से तय होनी चाहिए कि ज़रूरतमंद व्यक्ति को सक्षम पैरवी मिली या नहीं। न्याय तक पहुँच का अर्थ केवल अदालत में प्रवेश नहीं, बल्कि वहाँ अपनी बात प्रभावी ढंग से रखने का अवसर भी है। जब तक यह अवसर समाज में उपस्थित हर ज़रूरतमंद व्यक्ति को वास्तविक रूप से नहीं मिलता, समान न्याय का वादा अधूरा रहेगा।























