हरिद्वार | शान्तनु शुक्ला
सावन का महीना आते ही देशभर के शिव मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है। कोई भगवान शिव का जलाभिषेक करता है तो कोई बेलपत्र अर्पित कर अपनी आस्था व्यक्त करता है। लेकिन देवभूमि हरिद्वार में एक ऐसी शिव साधना होती है, जिसे देखकर बड़े-बड़े संत और श्रद्धालु भी नतमस्तक हो जाते हैं।
यह अनूठी साधना निरंजनी अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरि जी महाराज पिछले 36 वर्षों से लगातार कर रहे हैं। उनका यह संकल्प केवल व्यक्तिगत तप नहीं, बल्कि सनातन परंपरा और लोककल्याण के प्रति समर्पण का प्रतीक माना जाता है।
36 वर्षों से जारी है अटूट तपस्या
स्वामी कैलाशानंद गिरि जी हर साल सावन के पूरे महीने कठोर व्रत और तपस्या करते हैं। इस दौरान वे अन्न और जल का त्याग कर भगवान शिव की आराधना में लीन रहते हैं।
सबसे विशेष बात यह है कि वे प्रतिदिन लगभग 22 से 23 घंटे तक एक ही आसन पर बैठकर शिव साधना करते हैं। पूरे समय उनका ध्यान केवल भगवान भोलेनाथ की उपासना पर केंद्रित रहता है।
यह तपस्या हरिद्वार में गंगा तट स्थित दक्षिण काली मंदिर, चंडी घाट परिसर में संपन्न होती है, जहां देशभर से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
हर दिन बदलता है भगवान शिव का दिव्य श्रृंगार
सावन के दौरान केवल साधना ही नहीं, बल्कि भगवान शिव का श्रृंगार भी भक्तों के आकर्षण का केंद्र रहता है।
प्रतिदिन बाबा भोलेनाथ को अलग-अलग स्वरूप में सजाया जाता है। कभी ताजे फलों से, कभी सुगंधित फूलों से, तो कभी सब्जियों, मिठाइयों, मेवा और ड्राई फ्रूट्स से विशेष श्रृंगार किया जाता है।
श्रद्धालुओं का कहना है कि जैसे किसी दूल्हे को प्रेमपूर्वक सजाया जाता है, उसी श्रद्धा और भक्ति से प्रतिदिन महादेव का नया स्वरूप तैयार किया जाता है।
सावन पूर्णिमा पर होती है साधना की पूर्णाहुति
पूरे महीने चलने वाली इस कठोर तपस्या का समापन सावन पूर्णिमा के दिन विशेष धार्मिक अनुष्ठानों के साथ होता है।
इस अवसर पर शिव पूजन, जलाभिषेक, महाआरती, गंगा पूजन, पालकी यात्रा और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच भव्य आयोजन किया जाता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं।
संत समाज ने बताया विश्व कल्याण का तप
इस वर्ष साधना की पूर्णाहुति के अवसर पर अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्रीमहंत रविंद्रपुरी महाराज सहित 13 अखाड़ों के अनेक संत उपस्थित रहे।
उन्होंने कहा कि स्वामी कैलाशानंद गिरि जी की यह वार्षिक शिव साधना केवल व्यक्तिगत तपस्या नहीं, बल्कि संपूर्ण मानव समाज और विश्व कल्याण की भावना से जुड़ी हुई है।
इसी समर्पण और तप के कारण अनेक श्रद्धालु उन्हें भगवान शिव का स्वरूप मानकर श्रद्धा प्रकट करते हैं।
कौन हैं स्वामी कैलाशानंद गिरि जी?
- जन्मस्थान – बिहार के जमुई जिले का सिमुलतला।
- पद – निरंजनी अखाड़े के पीठाधीश्वर एवं आचार्य महामंडलेश्वर।
- विशेष पहचान – शिवपुराण के प्रकांड विद्वान और सनातन धर्म के प्रखर प्रवक्ता।
स्वामी जी का मानना है कि कलियुग में भगवान शिव के नाम का स्मरण और शिवपुराण का श्रवण ही मनुष्य को पापों से मुक्ति दिलाने का सबसे सरल मार्ग है।
सावन को लेकर स्वामी जी का संदेश
स्वामी कैलाशानंद गिरि कहते हैं कि सावन केवल पूजा-पाठ का महीना नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने और सनातन मूल्यों को जीवन में अपनाने का अवसर भी है।
उनके अनुसार, सावन के दौरान भगवान शिव की विशेष कृपा हरिद्वार पर बनी रहती है। जो श्रद्धालु सच्चे मन से सेवा, साधना और भक्ति करते हैं, उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं।
भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए स्वामी जी के तीन सरल उपाय
- गंगाजल से नियमित शिवलिंग का अभिषेक करें।
- वेद मंत्रों और शिवपुराण का श्रद्धापूर्वक श्रवण करें।
- चंपा, मंदार और धतूरे जैसे भगवान शिव के प्रिय पुष्प अर्पित करें।
निष्कर्ष
आज के समय में, जब अधिकांश लोग कुछ समय की पूजा के बाद ही थक जाते हैं, वहीं स्वामी कैलाशानंद गिरि जी पिछले 36 वर्षों से लगातार सावन के पूरे महीने प्रतिदिन 22 से 23 घंटे तक कठोर तप और शिव साधना कर रहे हैं।
उनकी यह साधना केवल आस्था का उदाहरण नहीं, बल्कि अनुशासन, त्याग और सनातन संस्कृति के प्रति अटूट समर्पण का जीवंत संदेश भी है। यही वजह है कि सावन के दौरान हरिद्वार में श्रद्धालुओं के बीच स्वामी कैलाशानंद गिरि जी महाराज का नाम विशेष श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता है।
FAQ
Q1. स्वामी कैलाशानंद गिरि जी कौन हैं?
वे निरंजनी अखाड़े के पीठाधीश्वर और आचार्य महामंडलेश्वर हैं तथा शिवपुराण के प्रकांड विद्वान माने जाते हैं।
Q2. स्वामी कैलाशानंद गिरि जी कितने वर्षों से सावन तप कर रहे हैं?
वे पिछले 36 वर्षों से लगातार सावन के पूरे महीने कठोर शिव साधना कर रहे हैं।
Q3. उनकी साधना कहां होती है?
हरिद्वार में गंगा के चंडी तट स्थित दक्षिण काली मंदिर परिसर में।
Q4. सावन में उनकी साधना की सबसे बड़ी विशेषता क्या है?
वे पूरे महीने अन्न-जल का त्याग कर प्रतिदिन लगभग 22 से 23 घंटे तक एक ही आसन पर बैठकर भगवान शिव की आराधना करते हैं।
Q5. सावन पूर्णिमा पर क्या आयोजन होता है?
साधना की पूर्णाहुति के अवसर पर शिव पूजन, जलाभिषेक, पालकी यात्रा, गंगा पूजन और महाआरती का भव्य आयोजन किया जाता है।


























