तृणमूल कांग्रेस के महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी (Abhishek banerjee) पर बंगाल के सोनारपुर में हमला हुआ. इसके बाद बंगाल की सियासत गरम है. एक ओर विपक्ष की सभी पार्टियां ममता बनर्जी के साथ आ गई हैं और इस आरोप के पीछे बीजेपी का हाथ बताया है. वहीं बीजेपी ने इसे 15 साल की सत्ता के दौरान टीएमसी के किए कामों का नतीजा बताया है. ममता बनर्जी इस मुद्दे पर पूरे राज्य स्तर पर व्यापक प्रदर्शन करने के मूड में हैं. अब इसके सहार ममता बनर्जी (Mamata banerjee) परिवार, पॉवर और पार्टी तीनों को बचाने की कोशिश में हैं.
ममता (Mamata banerjee) की पार्टी में टूट?
ममता बनर्जी (Mamata banerjee) ने सभी विधायकों को धरना प्रदर्शन की तैयारी के लिए एक बैठक में बुलाया था. चर्चा के मुताबिक मात्र 20 विधायक पहुंचे करीब 80 विधायक गायब रहे. ऐसे में पार्टी में टूट और पार्टी पर पकड़ कमजोर होने की खबर तैरने लगी है.

पार्टी, पॉवर और परिवार को बचाने की नीति पर ममता
ममता बनर्जी नाम सामने आते ही सबसे पहली छवि जो बनती है वह है जुझारू नेता की. ममता बनर्जी सत्ता में रहने के दौरान भी शायद ही कोई ऐसा महीना हो जिस महीने वह सड़क पर संघर्ष करते ना दिखी हों. वक्त के पहिए को करीब 36 साल पीछे ले चलिए कोलकाता के हाजरा मोड पर यूपी ममता बनर्जी, जो उस वक्त कांग्रेस की नेत्री थीं. उन पर हमला हुआ. उस घटना ने ममता बनर्जी को सत्ता से टकराने वाली जुझारू नेता बना दिया. एक बार फिर क्या अभिषेक बनर्जी उसी फॉर्मूला को अपना रहे हैं.
व्यक्तिगत चोट को राजनीतिक लाभ में बदलने माहिर हैं ममता
ममता बनर्जी के सियासी सफर को देखिएगा. तो सत्ता के साथ टकराहट और व्यक्तिगत चोट को सियासी लाभ में कन्वर्ट करने में माहिर हैं ममता बनर्जी. लेफ्ट के साथ की तमाम लड़ाई यदि आप भूल गये हैं तो 2021 के चुनाव को याद करिए. व्हीलचेयर पर उनका प्रचार शानदार सियासी तीर था. सफलता के शिखर पर पहुंचा दिया.
क्या अभिषेक बनर्जी अपनी बुआ के रास्ते पर हैं?
अभिषेक बनर्जी व्यक्तिगत चोट को सियासी माइलेज बनाने के लिए दिल्ली में कानूनी अधिकार अख्तियार करने के साथ ही बंगाल की सड़कों को गर्म करने में जुटे हुए हैं. लेकिन सियासी विश्लेषकों का मानना है कि काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ती है. एक तो 15 साल जैसे लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद आप सियासी विपक्ष के रूप में सिंपैथी का सियासी माइलेज ले पाएंगे ऐसी संभावना कम होती है. हालांकि पूर्व प्रधानमंत्र इंदिरा गांधी आपातकाल के दर्द को झेल चुके देश ने माफ करके फिर सत्ता की चाभी सौंप दी थी. सियासी परिणाम क्या होगा यह तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन ममता कुर्सी से उतरते ही सड़क पर आ गई हैं यह भी एक लोकतांत्रिक नेता का शानदार तरीका होता है.
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