History Of Turkman Gate: दिल्ली के ऐतिहासिक तुर्कमान गेट इलाके में मंगलवार देर रात उस समय हड़कंप मच गया, जब आधी रात को बुलडोजर की आवाजें सुनाई देने लगीं, 6 जनवरी 2026 की रात दिल्ली नगर निगम (MCD) की टीम ने फैज-ए-इलाही मस्जिद के पास अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई करते हुए अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया शुरू की.
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तुर्कमान गेट क्या है और कहां स्थित है?
तुर्कमान गेट पुरानी दिल्ली के ऐतिहासिक इलाकों में से एक है, मुगल काल से जुड़ा यह क्षेत्र वर्षों से गरीब और मध्यम वर्गीय लोगों का बसेरा रहा है, 1970 के दशक में यह इलाका अचानक देश की राजनीति के केंद्र में आ गया.
आपातकाल और तुर्कमान गेट विवाद की शुरुआत
साल 1975 से 1977 के बीच देश में आपातकाल लगाया गया था, इसी दौरान दिल्ली में बड़े पैमाने पर झुग्गी हटाओ अभियान चलाया गया. तुर्कमान गेट इलाके में भी अवैध निर्माण हटाने के नाम पर बुलडोजर चलाए गए, स्थानीय लोगों ने जब अपने घर तोड़े जाने का विरोध किया, तो हालात बेकाबू हो गए.
गोलीबारी और मौतों के आरोप
विवाद का सबसे गंभीर पहलू तब सामने आया जब विरोध कर रहे लोगों पर पुलिस फायरिंग के आरोप लगे, सरकारी आंकड़ों में मौतों की संख्या सीमित बताई गई. वहीं, प्रत्यक्षदर्शियों और सामाजिक संगठनों का दावा था कि वास्तविक संख्या कहीं ज्यादा थी. यही वजह है कि तुर्कमान गेट कांड आज भी एक विवादित और अनसुलझा सवाल बना हुआ है.
संजय गांधी की भूमिका पर सवाल
इस पूरे मामले में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी की भूमिका को लेकर सबसे ज्यादा विवाद हुआ. आरोप लगे कि उनके निर्देश पर जबरन नसबंदी और झुग्गी हटाओ अभियान को सख्ती से लागू किया गया. हालांकि, इस पर अलग-अलग राजनीतिक दलों के बीच आज भी मतभेद हैं.
राजनीतिक असर और जन प्रतिक्रिया
तुर्कमान गेट विवाद ने आम जनता के मन में गहरा आक्रोश पैदा किया, 1977 के चुनावों में इसका सीधा असर देखने को मिला. कांग्रेस को भारी नुकसान हुआ, आपातकाल को लोकतंत्र पर सबसे बड़ा हमला माना गया.
इतिहास में तुर्कमान गेट का स्थान
तुर्कमान गेट विवाद सिर्फ दिल्ली नहीं, बल्कि पूरे भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में एक चेतावनी की तरह देखा जाता है, यह घटना बताती है कि सत्ता के दुरुपयोग का खामियाजा सबसे पहले आम और गरीब जनता को भुगतना पड़ता है.
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