संवाददाता, गोपालगंज। बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता और ‘कालीन भैया’ के नाम से देशभर में पहचान बना चुके Pankaj Tripathi एक बार फिर अपनी जड़ों की ओर लौटते नजर आए। मां की बरसी के अवसर पर वह अपने पैतृक गांव बेलसंड पहुंचे, जहां सितारों की चकाचौंध से दूर उनका बिल्कुल अलग और सादा रूप देखने को मिला।
गांव पहुंचते ही पंकज त्रिपाठी पूरी तरह से गांव की माटी में रंगे नजर आए। उन्होंने न सिर्फ अपनी मां को श्रद्धांजलि दी, बल्कि ग्रामीणों के बीच बैठकर पुराने दिनों की यादों को भी ताजा किया। गांव वालों के साथ उनकी आत्मीयता और अपनापन देखते ही बन रहा था।

वसंत की फिजा में फगुआ की तान
वसंत पंचमी के बाद फागुन की मस्ती गांव की फिजाओं में घुली हुई थी। इसी माहौल में पंकज त्रिपाठी ने ग्रामीणों के साथ मिलकर फगुआ गाया। साधारण वेश-भूषा में, हारमोनियम और ढोलक की थाप पर बुजुर्गों और युवाओं के साथ सुर मिलाते हुए वह किसी अभिनेता की तरह नहीं, बल्कि गांव के अपने ही बेटे की तरह नजर आए।
ग्रामीणों का कहना है कि पंकज त्रिपाठी जब भी गांव आते हैं, तो वह यह भूल जाते हैं कि वह नेशनल अवॉर्ड जीत चुके अभिनेता हैं। गांव में वह सिर्फ ‘पंकज’ बनकर रहते हैं, सबके साथ हंसते-बोलते और आत्मीयता से समय बिताते हैं।

मां की बरसी पर भावुक हुए पंकज
मां की बरसी के मौके पर पंकज त्रिपाठी काफी भावुक नजर आए। उन्होंने परिवार के साथ धार्मिक अनुष्ठान में भाग लिया और मां को श्रद्धांजलि अर्पित की। पंकज त्रिपाठी अक्सर अपने साक्षात्कारों में यह कहते रहे हैं कि उनकी सफलता के पीछे उनके माता-पिता और गांव के संस्कारों की बड़ी भूमिका है।
उनका मानना है कि गांव की यही माटी, यहां की सादगी और संस्कार उन्हें अभिनय की दुनिया में मजबूती और संतुलन देते हैं। शायद यही वजह है कि बड़े पर्दे पर दमदार अभिनय करने वाले पंकज त्रिपाठी असल जिंदगी में भी जमीन से जुड़े हुए नजर आते हैं।
गांव से जुड़ाव ही पहचान
गोपालगंज की माटी से उनका यह जुड़ाव एक बार फिर यह साबित करता है कि सच्ची पहचान शोहरत से नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े रहने से बनती है। मां की बरसी पर गांव आकर पंकज त्रिपाठी ने न सिर्फ एक बेटे का फर्ज निभाया, बल्कि यह भी दिखाया कि सफलता के शिखर पर पहुंचकर भी इंसान अपनी मिट्टी को नहीं भूलता।
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