नालंदा। प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के पुनरुद्धार के प्रतीक नव नालंदा महाविहार में विश्व हिंदी दिवस के पावन अवसर पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण अकादमिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस विशेष परिचर्चा का विषय था “जापानी बौद्ध धर्म” के दार्शनिक, सांस्कृतिक और जीवन दर्शन संबंधी पक्ष। कार्यक्रम में जापान के ख्यातिनाम विद्वान सहित देश-विदेश के आचार्य, शोधार्थी और छात्रों ने भाग लिया।

जापान से पधारे प्रो. हीरोयुकी सातों का शानदार मुख्य व्याख्यान
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि टोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ फॉरेन स्टडीज़ के प्रख्यात विद्वान प्रो. हीरोयुकी सातों ने जापानी बौद्ध धर्म पर अपना विशेषज्ञता पूर्ण व्याख्यान प्रस्तुत किया।
प्रो. सातों ने अपने व्याख्यान की शुरुआत करते हुए कहा:
“जापानी बौद्ध धर्म केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि यह जीवन को समझने, जीने और अनुभव करने की समग्र पद्धति है।”
उन्होंने जापानी बौद्ध धर्म के तीन प्रमुख संप्रदायों पर विस्तार से प्रकाश डाला:
ज़ेन बौद्ध धर्म: ध्यान और आत्म-जागरण पर आधारित यह परंपरा जापानी समुराई संस्कृति और कला को गहराई से प्रभावित करती है।
शुद्धभूमि बौद्ध धर्म: भक्ति मार्ग पर आधारित यह संप्रदाय आम जनमानस में अत्यंत लोकप्रिय है।
निचिरेन बौद्ध धर्म: सामाजिक सक्रियता और लोटस सूत्र पर आधारित यह परंपरा आधुनिक जापान में प्रभावशाली है।

जापानी कला-संस्कृति पर बौद्ध प्रभाव
प्रो. सातों ने बताया कि भारतीय बौद्ध दर्शन ने जापानी कला को कैसे नया आयाम दिया। चाय समारोह (Tea Ceremony), हाइकु काव्य, बोंसाई कला और इकेबाना (फूलों की सजावट) में बौद्ध दर्शन की गहरी छाप दिखाई। विशेष रूप से वाबी-साबी की अवधारणा पर उन्होंने विस्तृत चर्चा की, जो अपूर्णता की सुंदरता को स्वीकार करने का जापानी दर्शन है।
कुलपति सिद्धार्थ सिंह की प्रेरणादायक अध्यक्षीय टिप्पणी
कार्यक्रम की अध्यक्षता नव नालंदा महाविहार के कुलपति डॉ. सिद्धार्थ सिंह ने की। उन्होंने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा:
“हिंदी भाषा केवल भारत की नहीं, बल्कि वैश्विक संवाद की सशक्त माध्यम है। प्राचीन नालंदा से निकला बौद्ध ज्ञान आज भी जापान सहित विश्व के कोने-कोने में जीवंत है।”
कुलपति ने नालंदा की वैश्विक शैक्षणिक परंपरा को पुनर्जनन देने के लिए हिंदी को महत्वपूर्ण सेतु बताया।

बीज व्याख्यान और विशेषज्ञ चर्चा
बीज व्याख्यान में प्रो. रवींद्र नाथ श्रीवास्तव परिचय दास ने ज़ेन दर्शन को समकालीन जीवन से जोड़ा। उन्होंने बताया कि ज़ेन की माइंडफुलनेस अवधारणा आज तनावग्रस्त आधुनिक जीवन के लिए रामबाण औषधि है।
कार्यक्रम में नालंदा महाविहार के आचार्यगण, शोधार्थी, विभिन्न विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर और बड़ी संख्या में छात्र उपस्थित रहे। यह परिचर्चा नालंदा को वैश्विक बौद्ध अध्ययन का केंद्र बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हुई।
रिपोर्ट: वीरेंद्र कुमार, नालंदा
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