Why Somnath is first Jyotirlinga: भारत की सनातन परंपरा में भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों का विशेष महत्व है, इन सभी में सोमनाथ ज्योतिर्लिंग को पहला स्थान प्राप्त है. अक्सर श्रद्धालुओं के मन में यह प्रश्न उठता है कि आखिर सोमनाथ को ही 12 ज्योतिर्लिंगों में प्रथम क्यों माना गया? इसके पीछे गहरी पौराणिक मान्यताएं, ऐतिहासिक घटनाएं और धार्मिक रहस्य जुड़े हुए हैं.
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पौराणिक कथा: चंद्रदेव और शिव कृपा
शिव पुराण के अनुसार, चंद्रदेव ने दक्ष प्रजापति की 27 कन्याओं से विवाह किया था, लेकिन वे केवल रोहिणी को ही अधिक प्रेम करते थे. इससे क्रोधित होकर दक्ष ने चंद्रदेव को क्षय रोग का श्राप दे दिया। श्राप के कारण चंद्रमा की कांति क्षीण होने लगी और वे धीरे-धीरे क्षीण होने लगे. कष्ट से मुक्ति पाने के लिए चंद्रदेव ने प्रभास क्षेत्र में भगवान शिव की कठोर तपस्या की, चंद्रदेव की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें श्राप से मुक्ति दी और वहीं ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए. चंद्रदेव द्वारा स्थापित होने के कारण इस ज्योतिर्लिंग को ‘सोमनाथ’ कहा गया—अर्थात सोम (चंद्र) के स्वामी.
सबसे पहले प्रकट हुआ ज्योतिर्लिंग
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सोमनाथ ज्योतिर्लिंग ही सबसे पहले पृथ्वी पर प्रकट हुआ. इसी कारण इसे 12 ज्योतिर्लिंगों में पहला स्थान दिया गया. शिव पुराण में ज्योतिर्लिंगों का वर्णन करते समय भी सोमनाथ का नाम सर्वप्रथम आता है.
प्रभास क्षेत्र का विशेष महत्व
सोमनाथ मंदिर गुजरात के प्रभास पाटन में स्थित है, यह स्थान प्राचीन काल से ही अत्यंत पवित्र माना गया है. मान्यता है कि यहीं चंद्रदेव को नया जीवन मिला, यहीं भगवान शिव ने करुणा और अनुग्रह का संदेश दिया. यह स्थान शिव भक्ति का आदि केंद्र माना जाता है.
विनाश के बाद भी पुनर्निर्माण: आस्था की विजय
सोमनाथ मंदिर को इतिहास में कई बार आक्रमणों के कारण तोड़ा गया, लेकिन हर बार इसका पुनर्निर्माण हुआ. यह मंदिर सनातन धर्म की अडिग आस्था, साहस और पुनर्जन्म का प्रतीक बन गया, यही कारण है कि इसे न केवल पहला ज्योतिर्लिंग, बल्कि शिव भक्ति का प्रतीक स्तंभ भी माना जाता है.
धार्मिक और आध्यात्मिक कारण
सोमनाथ ज्योतिर्लिंग को चंद्रमा से जुड़ा हुआ माना जाता है. यहां दर्शन करने से मानसिक शांति और रोगों से मुक्ति की कामना की जाती है. शिव भक्तों के लिए यह स्थान आदि ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजनीय है.
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