Black color is prohibited in festivals and pujas:भारतीय संस्कृति में रंगों का विशेष महत्व है. हर रंग किसी न किसी भावना, ऊर्जा और प्रतीक से जुड़ा होता है, इन्हीं रंगों में काले रंग को अक्सर पूजा-पाठ और त्योहारों में नकारात्मक माना जाता है, लेकिन सवाल यह है कि काला रंग क्यों अशुभ या नकारात्मक समझा जाता है? इसके पीछे धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ सामाजिक और मानसिक कारण भी जुड़े हैं.
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धार्मिक मान्यताओं में काले रंग का अर्थ
हिंदू धर्मग्रंथों और परंपराओं में काला रंग अंधकार, अज्ञान और नकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना गया है. पूजा और शुभ कार्यों में प्रकाश, पवित्रता और सकारात्मकता को महत्व दिया जाता है, इसलिए सफेद, पीला, लाल जैसे रंग अधिक प्रचलित हैं. काले रंग को ऐसी ऊर्जा से जोड़ा गया है जो सकारात्मक तरंगों को अवशोषित कर लेती है, यही कारण है कि इसे पूजा के समय पहनने या उपयोग करने से बचने की सलाह दी जाती है.
पूजा-पाठ में काला रंग क्यों वर्जित माना जाता है?
मान्यता है कि पूजा के दौरान मन और वातावरण का शुद्ध होना आवश्यक होता है. काला रंग मन में उदासी, भय और रहस्य की भावना उत्पन्न कर सकता है, जो ध्यान और साधना में बाधा बनता है. इसी कारण से मंदिरों और धार्मिक अनुष्ठानों में काले वस्त्र पहनने की परंपरा नहीं है.
त्योहारों में काले रंग से परहेज क्यों?
त्योहार उल्लास, उत्साह और सकारात्मक ऊर्जा के प्रतीक होते हैं, ऐसे अवसरों पर चमकीले और हल्के रंग खुशहाली और समृद्धि को दर्शाते हैं. काला रंग इसके विपरीत, शोक और निराशा से जुड़ा माना जाता है, इसलिए त्योहारों में इसे अशुभ समझा जाता है.
काला रंग और नकारात्मक ऊर्जा की धारणा
कुछ धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, काला रंग नकारात्मक शक्तियों को आकर्षित कर सकता है, यही वजह है कि बच्चों को काला टीका लगाया जाता है, ताकि नकारात्मक ऊर्जा वहीं रुक जाए और बच्चे सुरक्षित रहें. यह उदाहरण बताता है कि काला रंग स्वयं बुरा नहीं, बल्कि ऊर्जा को रोकने वाला माना जाता है.
वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक पहलू
मनोविज्ञान के अनुसार, काला रंग गंभीरता, भय और एकांत का संकेत देता है. अधिकतर धार्मिक और उत्सव के माहौल में हल्के और जीवंत रंग मन को प्रसन्न और सक्रिय रखते हैं, जबकि काला रंग मानसिक ऊर्जा को दबा सकता है.
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