PhuleraDooj2026: फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाई जाने वाली फुलेरा दूज को होली उत्सव की औपचारिक शुरुआत माना जाता है. कई श्रद्धालुओं के मन में सवाल रहता है कि आखिर होली जैसे बड़े रंगोत्सव की शुरुआत इसी दिन से क्यों होती है? इसके पीछे धार्मिक मान्यताएं, कृष्ण भक्ति परंपरा और ब्रज की विशेष परंपराएं जुड़ी हुई हैं.
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क्या है फुलेरा दूज?
फुलेरा दूज फाल्गुन शुक्ल द्वितीया को आती है. “फुलेरा” शब्द का अर्थ है “फूलों से सजी हुई”, इस दिन भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी को फूलों से श्रृंगारित कर उनकी विशेष पूजा की जाती है. मंदिरों में फूलों की होली खेली जाती है, जो आने वाले रंगों के पर्व का संकेत मानी जाती है.
होली की शुरुआत इसी दिन क्यों?
धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने राधा जी के साथ सबसे पहले फूलों की होली खेली थी, यही कारण है कि रंगों की होली से पहले फूलों की होली की परंपरा शुरू हुई. ब्रज क्षेत्र, खासकर वृंदावन और मथुरा में इस दिन से होली के उत्सव की शुरुआत हो जाती है. प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर में फुलेरा दूज पर विशेष उत्सव आयोजित होता है, जहां भक्तों पर फूलों की वर्षा की जाती है.
धार्मिक महत्व
यह दिन अत्यंत शुभ माना जाता है विवाह, सगाई और नए कार्यों की शुरुआत के लिए शुभ मुहूर्त माना जाता है, मान्यता है कि इस दिन राधा-कृष्ण की पूजा करने से दांपत्य जीवन में सुख और प्रेम बढ़ता है. फुलेरा दूज को होली का निमंत्रण दिवस भी कहा जाता है, क्योंकि इसी दिन से ब्रज में फाग, कीर्तन और रंगोत्सव की तैयारियां तेज हो जाती हैं.
सांस्कृतिक दृष्टि से महत्व
फुलेरा दूज केवल धार्मिक पर्व ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक परंपरा का प्रतीक भी है. यह पर्व प्रेम, उल्लास और वसंत ऋतु के आगमन का संदेश देता है. फूलों की सुगंध और भक्ति रस से भरा यह दिन आने वाले रंगों के पर्व की शुरुआत का संकेत बन जाता है.
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