MakarSankranti2026: मकर संक्रांति भारत के प्रमुख सूर्य पर्वों में से एक है, इस दिन सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं और उत्तरायण की शुरुआत होती है. देश के अलग-अलग हिस्सों में यह पर्व अलग नामों से मनाया जाता है, लेकिन उत्तर भारत खासतौर पर उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में इस दिन खिचड़ी खाने और दान करने की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है. सवाल यह है कि आखिर खिचड़ी खाने की परंपरा कब और क्यों शुरू हुई?
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कब शुरू हुई खिचड़ी खाने की परंपरा?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मकर संक्रांति पर खिचड़ी खाने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है. कुछ विद्वान इसे वैदिक काल से जोड़ते हैं, जबकि लोककथाओं में इसका संबंध भगवान सूर्य और भगवान विष्णु की उपासना से बताया जाता है. उत्तर प्रदेश में इसे “खिचड़ी पर्व” भी कहा जाता है, जहां प्रयागराज जैसे तीर्थ स्थलों पर इस दिन विशेष स्नान और खिचड़ी का भोग लगाया जाता है.
खिचड़ी ही क्यों? जानिए धार्मिक कारण
धर्मशास्त्रों के अनुसार, खिचड़ी सात्विक भोजन है. इसमें चावल, दाल, घी और कभी-कभी सब्जियां मिलाई जाती हैं, जो शरीर और मन—दोनों को शुद्ध करती हैं, मकर संक्रांति पर सूर्य देव की पूजा होती है और खिचड़ी को सूर्य देव को अर्पित करने के बाद ग्रहण करना पुण्यदायी माना जाता है. मान्यता है कि इससे रोग, शोक और दरिद्रता दूर होती है.
वैज्ञानिक कारण भी है बेहद खास
सिर्फ धार्मिक ही नहीं, इसके पीछे वैज्ञानिक तर्क भी हैं, मकर संक्रांति के समय मौसम ठंडा होता है और शरीर की पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है. खिचड़ी हल्की और सुपाच्य होती है, दाल से प्रोटीन और चावल से ऊर्जा मिलती है, घी शरीर को गर्मी देता है, इसी वजह से आयुर्वेद में भी खिचड़ी को पूर्ण और संतुलित आहार माना गया है.
दान से जुड़ी है परंपरा
मकर संक्रांति पर खिचड़ी के साथ-साथ चावल, दाल, तिल और घी का दान करना शुभ माना जाता है, मान्यता है कि इस दिन किया गया दान सूर्य देव को विशेष रूप से प्रिय होता है और इससे जीवन में सुख-समृद्धि आती है.
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