IndianFestivals: मकर संक्रांति का पर्व देशभर में अलग-अलग परंपराओं के साथ मनाया जाता है. उत्तर भारत में तिल-गुड़, तो वहीं बिहार, उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में मकर संक्रांति पर दही-चूड़ा खाना शुभ माना जाता है, यह परंपरा सिर्फ स्वाद तक सीमित नहीं, बल्कि इसके पीछे धार्मिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक कारण भी छिपे हैं.
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परंपरा से जुड़ा धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मकर संक्रांति सूर्य देव को समर्पित पर्व है. दही को पवित्र और सात्विक भोजन माना गया है, जबकि चूड़ा (चावल से बना आहार) समृद्धि और अन्नपूर्णा का प्रतीक है, मान्यता है कि इस दिन दही-चूड़ा का सेवन करने से घर में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है.
बिहार-झारखंड की खास परंपरा
बिहार और झारखंड में मकर संक्रांति को “तिल संक्रांति” भी कहा जाता है, इस दिन सुबह स्नान के बाद दही-चूड़ा, तिलकुट और गुड़ का भोग लगाया जाता है. माना जाता है कि यह भोजन सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करता है और नए मौसम की अच्छी शुरुआत करता है.
स्वास्थ्य से भी जुड़ा है दही-चूड़ा
आयुर्वेद के अनुसार, दही और चूड़ा का संयोजन सर्दियों में शरीर के लिए लाभकारी माना जाता है. दही पाचन को मजबूत करता है, चूड़ा हल्का और ऊर्जा देने वाला होता है, यह भोजन शरीर को ठंड और कमजोरी से बचाने में मदद करता है, इसी कारण मकर संक्रांति जैसे मौसमी बदलाव के समय दही-चूड़ा खाना फायदेमंद माना जाता है.
दान और अतिथि सत्कार का प्रतीक
कई जगहों पर मकर संक्रांति के दिन दही-चूड़ा का दान भी किया जाता है, घर आए अतिथियों को दही-चूड़ा खिलाना सम्मान और सद्भाव का प्रतीक माना जाता है.
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