ShivlingRahasya: भारत में भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व है. शिवलिंग पर जल, दूध, दही, शहद, घी, बेलपत्र और भस्म अर्पित की जाती है, लेकिन एक सवाल अक्सर लोगों के मन में आता है. शिवलिंग पर चढ़ाया गया प्रसाद क्यों नहीं खाया जाता? आइए जानते हैं इसके पीछे छिपे धार्मिक, शास्त्रीय कारण.
तीन माओवादियों ने Bihar DGP के सामने किया आत्मसमर्पण
शास्त्रों में क्या कहा गया है?
हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार शिवलिंग पूज्य प्रतीक (Symbol of Energy) है, न कि प्रसाद ग्रहण करने योग्य मूर्ति. शिवलिंग पर चढ़ाई गई वस्तुएं भगवान शिव को समर्पित होती हैं, लेकिन उन्हें भक्तों द्वारा ग्रहण करने का विधान नहीं है. मान्यता है कि शिवलिंग पर अर्पित चीजें त्याग और समर्पण का प्रतीक होती हैं, न कि भोग का.
शिवलिंग और ‘निर्गुण स्वरूप’ की मान्यता
भगवान शिव को निर्गुण और निराकार माना गया है, शिवलिंग इसी निराकार ब्रह्म का प्रतीक है. इसलिए शिवलिंग पर चढ़ाई गई सामग्री को प्रसाद के रूप में ग्रहण नहीं किया जाता, बल्कि उसे पृथ्वी या प्रकृति को अर्पित कर दिया जाता है. नाल (जल निकास) का विशेष महत्व शिवलिंग के नीचे बनी नाल से जल और अन्य द्रव्य बाहर निकलते हैं.
शास्त्रों में बताया गया है कि इस नाल से निकला जल ऊर्जा के प्रवाह को दर्शाता है, जिसे ग्रहण करना वर्जित माना गया है, इसी कारण शिवलिंग पर चढ़ा जल या दूध प्रसाद के रूप में नहीं लिया जाता.
तो फिर क्या किया जाता है?
शिवलिंग पर चढ़ाई गई सामग्री को पवित्र मानकर उसे पीपल, तुलसी, या बहते जल में प्रवाहित किया जाता है या फिर मंदिर की परंपरा के अनुसार नष्ट कर दिया जाता है. जबकि शिवलिंग के पास रखे फल, मिठाई या नैवेद्य को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जा सकता है.
इसे भी पढ़े-Lord Krishna: कौन-से फूल सबसे ज्यादा प्रिय हैं?


























