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विवादों में घिरी ‘Toxic’ पर अनुराग कश्यप बोले– डरने वालों का सिनेमा नहीं

Anurag Kashyap on the controversial 'Toxic': It's not a movie for the fearful

नई दिल्ली: बॉलीवुड निर्देशक अनुराग कश्यप ने आगामी फिल्म Toxic: A Fairy Tale for Grown-Ups के टीज़र के खिलाफ हो रहे विवाद का खुलकर जवाब दिया है और इसे एक „बेहद साहसी कोशिश“ बताया है। कश्यप ने कहा कि टीज़र पर विरोध समाजिक दोहरे मानदंडों को दर्शाता है और सिनेमा की आज़ादी के लिए यह महत्वपूर्ण बहस है।

‘Toxic’ टीज़र पर विवाद क्या है?

‘Toxic’ का पहला टीज़र 8 जनवरी 2026 को रिलीज़ किया गया और यह कुछ ही समय में वायरल हो गया, लेकिन कुछ दर्शकों ने इसकी एक संक्षिप्त, लेकिन बोल्ड सीन को लेकर कड़ी आलोचना शुरू कर दी। उन्होंने टीज़र को अत्यधिक बोल्ड या ग्राफिक बताया, जिससे फिल्म के कुछ सीनों पर विवाद खड़ा हो गया।

कश्यप का बयान: “सांस्कृतिक पाखंड दिखता है”

17वें बेंगलुरु इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल के दौरान ‘Fearless Filmmaking’ सत्र में अनुराग कश्यप ने कहा कि इस तरह का विरोध समाजिक दोहरे मानदंडों को उजागर करता है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्यों जब पुरुष अभिनेता शर्टलेस दिखाई देते हैं या साहसी सीन करते हैं, तो कोई प्रश्न नहीं उठता, लेकिन महिला की सेक्सुअलिटी दिखाने पर तुरंत आलोचना शुरू हो जाती है।

कश्यप ने कहा, “विरोध यह दिखाता है कि हम किस तरह कुछ चीज़ों को आसानी से स्वीकार कर लेते हैं और कुछ पर तुरंत उन्माद मचा देते हैं। यह असमान व्यवहार सिनेमा और संस्कृति के प्रति हमारे दृष्टिकोण को परखने का मौका देता है।”

फ़िल्म और टीज़र का प्रसंग

Toxic यश की अहम् भूमिका वाली फिल्म है जो 19 मार्च 2026 को रिलीज़ होने वाली है। टीज़र को लाखों दर्शकों ने देखा और यह सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स पर चर्चा में रहा।

बॉलीवुड में रचनात्मक आज़ादी का सवाल

कश्यप ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि सिनेमा को बल्कि रचनात्मक रूप से आज़ाद होना चाहिए, और किसी भी कला को सीमाओं में बाँधने से पहले उसके सांस्कृतिक और सामाजिक संदर्भों पर विचार किया जाना चाहिए। उनकी टिप्पणियाँ यह संकेत देती हैं कि इंडस्ट्री में क्रिएटिव फ़्रीडम को लेकर अभी भी बहस जारी है।

अनुराग कश्यप ने ‘Toxic’ टीज़र विवाद को सिर्फ एक विरोध नहीं माना, बल्कि इसे भारतीय सिनेमा में दोहरे मानदंडों की समस्या का प्रतीक बताया। उनके अनुसार, अगर सिनेमा को आगे बढ़ना है तो कलाकारों और निर्देशकों को रचनात्मक आज़ादी की ज़रूरत है—जिसे आलोचना और विरोध की परवाह किए बिना समझा जाना चाहिए।

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