Lord Vishnu is called Satyanarayan: हिंदू धर्म में भगवान विष्णु को अनेक नामों से जाना जाता है, लेकिन “श्रीहरि सत्यनारायण” नाम का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है. सत्यनारायण व्रत और कथा भारत के लगभग हर हिस्से में श्रद्धा के साथ की जाती है, ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि आखिर भगवान विष्णु को सत्यनारायण क्यों कहा गया? इसके पीछे क्या धार्मिक और शास्त्रीय आधार है?
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सत्यनारायण नाम का अर्थ
‘सत्यनारायण’ दो शब्दों से मिलकर बना है सत्य यानी सत्य, धर्म और न्याय नारायण यानी समस्त सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु अर्थात सत्यनारायण वह स्वरूप हैं जो सत्य के प्रतीक और सृष्टि के संरक्षक हैं, शास्त्रों के अनुसार भगवान विष्णु स्वयं सत्य का अवतार हैं और सत्य के मार्ग पर चलने वालों की रक्षा करते हैं.
पुराणों में सत्यनारायण का उल्लेख
स्कंद पुराण और भविष्य पुराण में सत्यनारायण व्रत और कथा का विस्तार से वर्णन मिलता है, इन ग्रंथों में बताया गया है कि जब समाज में असत्य, अधर्म और अन्याय बढ़ता है, तब भगवान विष्णु सत्यनारायण रूप में प्रकट होकर भक्तों को धर्म के मार्ग पर लौटाते हैं.
सत्यनारायण व्रत का महत्व
धार्मिक मान्यता है कि सत्यनारायण व्रत करने से जीवन में सत्य और सदाचार की वृद्धि होती है. आर्थिक, पारिवारिक और मानसिक कष्ट दूर होते हैं, भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है, यही कारण है कि विवाह, गृह प्रवेश, संतान प्राप्ति और नई शुरुआत के अवसर पर यह व्रत किया जाता है.
श्रीहरि और सत्य का संबंध
भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि वे धर्म की स्थापना के लिए अवतार लेते हैं, सत्य ही धर्म का आधार है. इसीलिए श्रीहरि को सत्यनारायण कहा गया, क्योंकि वे न केवल सत्य का पालन करते हैं, बल्कि भक्तों को भी सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं.
धार्मिक विश्वास और सामाजिक संदेश
धार्मिक विद्वानों के अनुसार सत्यनारायण कथा केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सत्य, ईमानदारी और नैतिक जीवन का संदेश देती है. कथा में असत्य बोलने और व्रत भंग करने के दुष्परिणामों का वर्णन भी मिलता है.
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