Shambhu Hostel Case: पटना में शंभु गर्ल्स हास्टल में नीट छात्रा की हत्या दो हफ्ते बीत गये। ताजा स्थिति है कि जांच चल रही है, लेकिन जवाब नहीं मिल रहे। जब सवाल बढ़ते जाएं और जवाब सिमटते जाएं तो मानना मुश्किल नहीं रह जाता कि मामला केवल जांच की अक्षमता का नहीं, बल्कि सिस्टम की मिलीभगत का भी हो सकता है। शक गहराता जा रहा है कि जांच की दिशा को जानबूझकर भटकाया जा रहा है। पांच जनवरी की रात पटना में हुई इस घटना के दो हफ्ते बाद भी पुलिस अब तक किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाई है। यह सामान्य आपराधिक मामलों में भी असामान्य देरी मानी जाती है। खासकर तब जब मामला मौत से जुड़ा हुआ हो और पीड़िता छात्रा हो। पुलिस का तर्क है कि “सभी एंगल से जांच चल रही है”, लेकिन यह जुमला अक्सर उन मामलों में इस्तेमाल होता है जहां टालमटोल कर जांच को कमजोर किया जाता है। घटनास्थल, कॉल डिटेल्स, हास्टल की एंट्री-एग्जिट रजिस्टर, सीसीटीवी फुटेज और इलाज से जुड़े मेडिकल रिकॉर्ड, ये सभी शुरुआती 72 घंटों में जुटाए जाने चाहिए थे। सवाल है कि यदि सबूत मौजूद थे तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई और यदि नहीं थे तो उन्हें सुरक्षित क्यों नहीं किया गया। देरी अपने-आप में इस आशंका को जन्म देती है कि पुलिस या तो दबाव में है या किसी को बचाने की कोशिश में।
प्रेम प्रसंग की थ्योरी
प्रेम प्रसंग की कहानी एक तरह से ध्यान भटकाने का तरीका है. छात्रा के मामले में भी ऐसी कहानी जानबूझकर उछाली जा रही है। मान भी लिया जाए कि छात्रा का किसी पारिवारिक करीबी से प्रेम प्रसंग था तो यह समझना जरूरी है कि प्रेम प्रसंग होना और सुनियोजित हत्या होना, दो बिल्कुल अलग-अलग तथ्य हैं। किसी भी तरह का निजी संबंध हत्या को न तो जायज ठहराता है और न ही जांच की दिशा तय करता है। लेकिन पुलिस के इशारे पर बार-बार इस एंगल को उछालना संकेत देता है कि पीड़िता के चरित्र को कठघरे में खड़ा कर मूल सवालों से ध्यान हटाया जा रहा है। असली सवाल है कि लड़की की हालत कैसे बिगड़ी, किसने उसे गंभीर स्थिति में छोड़ा और समय पर सूचना क्यों नहीं दी गई। प्रेम प्रसंग की आड़ में इन सवालों को दबाना जांच को कमजोर करने की रणनीति मानी जा सकती है।
हास्टल और अस्पतालों की भूमिका
घटना के बाद हास्टल संचालकों ने परिजनों को तत्काल सूचना नहीं दी। यह अपने-आप में गंभीर अपराध है। छात्रा के परिजनों को जानकारी किसी और स्रोत से मिली, जो बताता है कि कुछ न कुछ छिपाने की कोशिश हुई। इसके बाद चार दिनों तक इलाज के नाम पर छात्रा को अलग-अलग अस्पतालों में घुमाया जाता रहा। सवाल है कि जब हालत गंभीर थी तो एक ही अस्पताल में रेफरल और समुचित इलाज क्यों नहीं हुआ। क्या यह केवल लापरवाही थी या फिर मेडिकल रिकॉर्ड को उलझाने की कोशिश? हर अस्पताल में भर्ती, डिस्चार्ज और रेफरल का समय अगर क्रमवार देखा जाए तो कई खाली जगहें दिखती हैं। यही वजह है कि शक केवल पुलिस पर नहीं, बल्कि संबंधित अस्पतालों के डॉक्टरों पर भी गहराता है। यह लापरवाही नहीं, बल्कि सुनियोजित चुप्पी है।
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गरीब परिवार और खरीदे गए इंसाफ का सवाल
लड़की का परिवार गरीब है। ऐसे मामलों में अक्सर देखा गया है कि सिस्टम की संवेदनशीलता घट जाती है और इंसाफ एक सौदे में बदल जाता है। शुरुआती दिनों में मामले को दबाने की कोशिश, जांच में ढिलाई, जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई से बचना, ये सब संकेत देते हैं कि ताकत और पैसे का असर जांच पर पड़ा है। अगर यही घटना किसी प्रभावशाली परिवार की बेटी के साथ हुई होती तो क्या पुलिस इतनी धीमी होती? बारह दिन बाद भी न तो स्पष्ट आरोप तय हुए हैं, न ही जिम्मेदारी तय की गई है। यही देरी इस पूरे मामले में न्याय न मिलने की सबसे बड़ी वजह बनती दिख रही है।
लेखक- अरविंद शर्मा, (वरिष्ठ पत्रकार)























