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Basant Panchami 2026: दिल्ली की इस दरगाह में बसंत पंचमी पर क्यों चढ़ती है पीली चादर?

yellow sheet offered on Basant Panchami

Basant Panchami 2026: आज यानी 23 जनवरी, दिन शुक्रवार को देशभर में बसंत पंचमी का त्योहार धूमधाम से मनाया जा रहा है. बसंत पंचमी का नाम आते ही आमतौर पर मां सरस्वती की पूजा, पीले वस्त्र और ज्ञान–विद्या की आराधना की तस्वीर सामने आती है, लेकिन राजधानी दिल्ली में स्थित एक प्रसिद्ध दरगाह में इस दिन पीली चादर चढ़ाने की अनोखी परंपरा वर्षों से चली आ रही है, यह परंपरा धार्मिक आस्था के साथ-साथ गंगा-जमुनी तहज़ीब की खूबसूरत मिसाल भी मानी जाती है.

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किस दरगाह से जुड़ी है यह परंपरा?
दिल्ली की हजरत निज़ामुद्दीन औलिया दरगाह में बसंत पंचमी के दिन विशेष रूप से पीली चादर और पीले फूल चढ़ाने की परंपरा देखने को मिलती है, मान्यता है कि सूफी संत हजरत निज़ामुद्दीन औलिया को बसंत ऋतु अत्यंत प्रिय थी.

परंपरा की कहानी
किंवदंती के अनुसार, एक बार बसंत पंचमी के दिन कुछ श्रद्धालु पीले फूल और पीले वस्त्र पहनकर दरगाह पहुंचे थे, बसंत के रंग और उल्लास को देखकर सूफी संत अत्यंत प्रसन्न हुए. तभी से बसंत पंचमी पर दरगाह में पीले रंग से जुड़ी रस्में निभाई जाने लगीं, जो आगे चलकर पीली चादर चढ़ाने की परंपरा में बदल गईं.

पीले रंग का महत्व
पीला रंग बसंत ऋतु, खुशहाली और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है.

हिंदू परंपरा में यह रंग मां सरस्वती से जुड़ा है
सूफी मत में इसे रूहानी आनंद और उत्सव का रंग माना जाता है, इसी कारण बसंत पंचमी पर दरगाह में पीले फूलों, चादरों और सजावट का विशेष महत्व होता है.

आस्था और मन्नत का विश्वास
श्रद्धालुओं का मानना है कि बसंत पंचमी के दिन पीली चादर चढ़ाने से मन्नत पूरी होती है, जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं
शिक्षा, करियर और रोजगार में सफलता मिलती है. इसी विश्वास के चलते इस दिन दरगाह में बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं.

सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल
बसंत पंचमी पर दरगाह में हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोग एक साथ दुआ और प्रार्थना करते हैं, यह परंपरा भारत की साझी सांस्कृतिक विरासत और आपसी भाईचारे को मजबूती देती है.

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