वृंदावन : में आयोजित संत समागम को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने हिंदू समाज की एकता पर जोर दिया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि समाज में व्याप्त जाति, भाषा और पंथ आधारित भेदभाव राष्ट्र के लिए घातक है। भक्ति, ज्ञान संतुलन और पंच परिवर्तन के माध्यम से भारत को विश्व गुरु बनाने का मार्ग प्रशस्त करने का आह्वान किया।

फूट ही पराजय का मूल कारण
ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए भागवत जी ने कहा कि हिंदू समाज कभी शत्रु की वीरता या सैन्य बल से नहीं हारा। जब-जब पराजय हुई, उसका एकमात्र कारण आपसी फूट और भेदभाव रहा। भाषणों और कार्यक्रमों से आगे बढ़कर आचरण में बदलाव लाने की आवश्यकता बताई। हर हिंदू घर में समाज के सभी वर्गों के मित्रों का आना-जाना, पारिवारिक संवाद और सहभोज होना चाहिए। समाज को एकजुट कर राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया तेज करने पर बल दिया।
भक्ति के बिना ज्ञान रावण जैसा, कर्म विक्षिप्त
भक्ति को महान आध्यात्मिक शक्ति बताते हुए सरसंघचालक ने चेताया कि बिना भक्ति के ज्ञान रावण के अहंकार में बदल जाता है। कर्म पागलों जैसा विक्षिप्त हो जाता है। भारत की आध्यात्मिक जड़ों ने 500 वर्षों के विदेशी आक्रमणों के बावजूद सनातन धर्म को अक्षुण्ण रखा। महाभारत की कथा के माध्यम से धैर्य और शांति से आसुरी शक्तियों पर विजय पाने का संदेश दिया। संतों से अपील की कि वे समाज में एकता का प्रचार करें।
पंच परिवर्तन से धर्म राष्ट्र का स्वप्न
पंच परिवर्तन कार्यक्रम का उल्लेख करते हुए कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, समाजोत्थान और आत्म-अनुशासन पर जोर दिया। हिंदू समाज यदि अपनी सात्विक शक्ति जागृत कर ले तो अगले 20-30 वर्षों में भारत विश्व गुरु और धर्म राष्ट्र बन सकता है। समाज से अपेक्षा की कि केवल बातों तक सीमित न रहें, बल्कि व्यवहारिक स्तर पर एकता स्थापित करें। यह संदेश राष्ट्र निर्माण में भक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करता है।
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