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AmericaFirst: 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से बाहर आया अमेरिका

US Exit from 66 International Organizations: अमेरिका ने हाल के वर्षों में कई ऐसे फैसले लिए हैं, जिन्होंने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है. इन्हीं में से एक बड़ा और चौंकाने वाला तथ्य यह है कि अमेरिका अब तक करीब 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों, समझौतों और मंचों से बाहर आ चुका है. यह कदम केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संतुलन पर भी गहरा असर डालने वाला माना जा रहा है.

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66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से बाहर क्यों आया अमेरिका?
अमेरिका के इस फैसले के पीछे कई राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक कारण हैं. अमेरिका का मानना रहा है कि कुछ अंतरराष्ट्रीय संगठन, उसकी राष्ट्रीय संप्रभुता पर असर डालते हैं, आर्थिक बोझ बढ़ाते हैं और कई बार उसके राष्ट्रीय हितों के खिलाफ फैसले लेते हैं, इसी सोच के चलते अमेरिका ने कई वैश्विक मंचों से दूरी बना ली.

किन वजहों ने अमेरिका को यह फैसला लेने पर मजबूर किया?

1. राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता
अमेरिका की “America First” नीति के तहत यह माना गया कि अंतरराष्ट्रीय संगठन कई बार अमेरिकी नीतियों में हस्तक्षेप करते हैं, इसलिए राष्ट्रीय हितों को सबसे ऊपर रखा गया.

2. आर्थिक योगदान पर सवाल
अमेरिका कई संगठनों का सबसे बड़ा फंड देने वाला देश रहा है. अमेरिकी सरकार का कहना है कि इतना पैसा देने के बावजूद निर्णय प्रक्रिया में अमेरिका की भूमिका सीमित रहती है.

3. नीतिगत मतभेद
जलवायु परिवर्तन, मानवाधिकार, व्यापार नियमों और वैश्विक स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर अमेरिका और कई संगठनों के बीच मतभेद सामने आए.

4. घरेलू राजनीति का दबाव
अमेरिका के अंदर भी यह मांग उठती रही है कि पहले देश के नागरिकों पर खर्च हो, फिर दुनिया पर.

    किन संगठनों से अमेरिका ने दूरी बनाई?
    अमेरिका ने अलग-अलग समय पर जलवायु समझौते, स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़े मंच, मानवाधिकार परिषद, व्यापार और सुरक्षा से जुड़े अंतरराष्ट्रीय समूहों से खुद को अलग किया या अपनी भागीदारी सीमित की.

    दुनिया पर क्या पड़ेगा असर?
    अमेरिका के इस कदम से वैश्विक सहयोग कमजोर हो सकता है, अंतरराष्ट्रीय संस्थानों की फंडिंग पर असर पड़ेगा विकासशील देशों को अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. हालांकि कुछ देशों का यह भी मानना है कि इससे नई वैश्विक शक्तियों को उभरने का मौका मिलेगा.

    भारत और अन्य देशों के लिए क्या मायने?
    भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति, कूटनीतिक संतुलन साधने का मौका, नए अंतरराष्ट्रीय नेतृत्व की संभावना और बहुपक्षीय मंचों पर अपनी भूमिका मजबूत करने का अवसर भी लेकर आई है.

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