Worship is incomplete without Bhog: हिंदू धर्म में पूजा-पाठ केवल मंत्र उच्चारण या दीप जलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भाव, समर्पण और सेवा का प्रतीक मानी जाती है. इन्हीं परंपराओं में से एक है भगवान को भोग अर्पित करना, धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बिना भोग लगाए की गई पूजा को अधूरी माना जाता है. आखिर ऐसा क्यों है? आइए जानते हैं इसके पीछे छुपे का कारण.
भोग: केवल भोजन नहीं, भावनाओं का अर्पण
भोग का अर्थ केवल भोजन चढ़ाना नहीं होता, बल्कि यह भक्त की ओर से ईश्वर के प्रति कृतज्ञता और समर्पण का प्रतीक है, मान्यता है कि भक्त अपने परिश्रम से तैयार किए गए अन्न का पहला अंश भगवान को अर्पित करता है, जिससे अहंकार का त्याग और विनम्रता का भाव उत्पन्न होता है.
शास्त्रों में भोग का महत्व
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, पूजा में नैवेद्य (भोग) का विशेष स्थान है. कहा जाता है कि बिना नैवेद्य के पूजा पूर्ण फल नहीं देती, भोग अर्पण कर भक्त यह स्वीकार करता है कि जीवन में प्राप्त हर वस्तु ईश्वर की कृपा से है.
भोग से बनता है प्रसाद
भोग अर्पण के बाद वही भोजन प्रसाद बन जाता है, जिसे ग्रहण करना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है. मान्यता है कि प्रसाद शरीर के साथ-साथ मन को भी शुद्ध करता है.
बिना भोग पूजा क्यों अधूरी मानी जाती है?
धर्माचार्यों के अनुसार, भोग न लगाने से पूजा में सेवा भाव की कमी रह जाती है. पूजा केवल कर्मकांड बनकर रह जाती है, भक्त और भगवान के बीच का भावनात्मक संबंध अधूरा माना जाता है.
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